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शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

एक गीत : कभी कभी इस दिल को ....

एक गीत : कभी कभी इस दिल को




कभी कभी इस दिल को जाने क्या हो जाता है !

दुनिया लाख मना करती है अपनी गाता है



एक दीप भारी पड़ सकता है अँधियारों पर

सर पर बाँध कफ़न जो निकले सत्य विचारो पर

एक अकेली नौका जूझ रही है लहरों से

लोग रहे आदर्श झाड़ते खड़े किनारों पर


आँधी-पानी,तूफ़ां-बिजली राह रोकती हो-

अपनी धुन का पक्का राही कब रुक पाता है !



चरण वन्दना को आतुर हैं जो दरबारी हैं

कंठी-माला दंड-कमंडल लिए शिकारी हैं

हर चुनाव में कैसे कैसे स्वांग रचा करते

’स्विस-बैंक’ के खाताधारी लगे भिखारी हैं


खड़ा रहेगा साथ मिरे जिससे उम्मीदें थीं

ऐन वक़्त पर बिना रीढ का क्यों हो जाता है ?



जो लहरों के साथ साथ में बहा नहीं करते

जो सरकारी अनुदानों पर पला नहीं करते

जिसके अन्दर ज्योति-पुंज की किरणें बाकी हैं

अँधियारों की खुली चुनौती सहा नहीं करते


क्यों पीता है विष का प्याला सूली चढता है ?

जो दुनिया से हट कर अपनी राह बनाता है

कभी-कभी इस दिल को जाने .......

-आनन्द.पाठक

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन कविता..बहुत बधाई।

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 मयंक शास्त्री जी/पाण्डेय जी
उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद विशेषत:
शास्त्री जी को ,इस गीत को "चर्चा मंच’ में शामिल करने के लिए

सादर
आनन्द.पाठक

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